रविवार, 7 मार्च 2010
वह आत्महत्या कर ली...पूछो क्यों?
वह सुन्दर थी
वह सुशीला थी
वह गुणवती थी
वह पढ़ी-लिखी थी
उसमें भी आकाश को छू लेने का जज्बा था
वह भी नभ का सितारा बन चमक सकती थी
मगर वह आत्महत्या कर ली...पूछो क्यों?
अगर वह किसी की अर्धांगिनी होती
तो जीवन जीना सहज ही होता
अगर वह माँ हो जाती
बच्चे अच्छे संसर्ग में ही पलते-बढ़ते
जिस परिवार में वह मिलती
मिलकर ही वह रह जाती
घर टूटने से पहले शायद वह टूट जाती
भूल जाती अपने सारे दुःख
मानो वह है ही नहीं
विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी वह सबको खुश रखती
मगर वह आत्महत्या कर ली... पूछो क्यों?
हाँ, हाँ, बताओ ऐसा क्योंकि वह?
...तो सुनो---
वह एक गरीब बाप की बेटी थी
बाप ने उसे पढ़ा-लिखाकर
बी० ए० पास कराने का गंभीर अपराध किया था।
वह सोच रहा था बड़े ही आसानी से ढूंढ लेंगे
किसी पढ़े-लिखे अच्छा खाने-कमाने वाला दूल्हा
मगर उस बेचारे बाप को क्या मालूम था
क्या है बाज़ार में ऐसे दूल्हों का भाव
अपनी लाडली बिटिया के लिए
एक अच्छे से दूल्हे की खोज में
सालों भटकते रहे
समय, श्रम और धन की खूब हुई बर्वादी
पर दहेज़ की ऊँची मांग ने
कुल नतीजे को सिफर बना दिया।
बेटी बोली--बापू मेरे शादी किसी भीखमंगे से भी करा दो
तो मैं तुम्हें 'ना' न कहूँगी
पर जरा आप ही बताइये
क्या कोई बाप ऐसा करना चाहेगा?
घर में माँ बीमार-चिंतित, पिता हताश-निराश
बड़ा भाई और छोटी बहन हैरान-परेशान
और बेटी की तो सोच-सोचकर
आधी जान निकल गई थी
वह और पढ़कर कोई नौकरी हासिल करना चाहती थी
माँ-बाप पर बोझ नहीं बनना चाहती थी
मगर माँ-बाप ने सोचा कि
जब इतना पढ़ाया तो यह हाल है
और पढ़के न जाने क्या होगा
यह सोचकर बेटी की बात नहीं मानी
पर बेटी घर के सभी लोगों को
चिंता से मुक्त करना चाहती थी
जब कोई उपाय न दिखा
तो अचानक उसे सूझा रामबाण उपाय
और वह आत्महत्या कर ली
अब उसके घरवाले बेटी के इस अप्रत्याशित मौत पर खुश हुए या दुखी
तुम मत पूछना...
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
उपलब्धियां ही उपलब्धियां !!! (व्यंग्य कविता)
किसी को जानना हो अगर
आज़ादी के बाद देश की उपलब्धियां
देश के गाँव-गाँव में घूम आइये
जहाँ भी सुनें दो जून की रोटी के लिए
किसानों-मजदूरों-गरीबों का हाहाकार
वहाँ उपलब्धियां ही उपलब्धियां !
अजी कभी देश के महानगरों का
एक चक्कर लगा आइये
आसमान को छूती आलीशान बिल्डिंग
या फिर जहाँ भी देखें
चमचमाती कारों की लम्बी कतार
वहाँ उपलब्धियां ही उपलब्धियां !
क़र्ज़ के जंजाल में फंसकर
आत्महत्या कर रहे किसानों की चिंता क्यों?
किसानों के खेत बनेंगे क्रिकेट स्टेडियम
जिन स्टेडियमों में भी देखें
क्रिकेट खिलाड़ियों को रन बनाते धुंआधार
वहाँ उपलब्धियां ही उपलब्धियां !
हम कभी घूम आयें शहर के
होटल-पार्क, रेलवे स्टेशन व सड़क-चौराहे
जहाँ भी दर्शन हो देश के नौनिहालों का
चबाते गुटखा, उडाते सिगरेट का धुंआ बदबूदार
वहाँ उपलब्धियां ही उपलब्धियां !
कभी फुर्सत में निकालिए
देश के हाट -बाजारों में
जहाँ भी बिक रहे हों
देश की बेबस लड़कियां,
क़र्ज़ में लादे गरीबों का गुर्दा,
इमानदारी, सच्चाई और प्यार
वहां उपलब्धियां ही उपलब्धियां!
कभी 'विजिट' करें देश के
अंगरेजी माध्यम स्कूलों में
पढाई-लिखाई क्या होती है राम जाने
हाँ, जहाँ भी देखें शर्ट, पैंट, टाई , बैल्ट
किताब-कॉपी का सजा-धजा बाज़ार
वहां उपलब्धियां ही उपलब्धियां!
अजीदेखना है तो देखिये
'वसुधैव कुटुम्बकम' की बात करने वाले
भारत के एक-एक समाज को
जहां भी दिखे अपने-अपने स्वार्थ के लिए
टूटता-बिखरता घर-परिवार
वहां उपलब्धियां ही उपलब्धियां!
kabhee कीजिये इस्तेमाल सूचना के अधिकार का
जिन-जिन नेता-मंत्रियों-अधिकारियों के
घर, बैंक व स्विस बैंक खातों सेउजागर हो उनका भ्रष्टाचार
वहां उपलब्धियां ही उपलब्धियां!
....और अगर कहीं घूम नहीं सकते
ज्यादा दिमाग लगाना नहीं चाहते
तो हत्या, अपहरण, लूटपाट, धरना, प्रदर्शन, हड़ताल
छेड़छाड़ और बलात्कार के पढ़ लीजिये खबर
खोलकर किसी भी रोज़ का अखबार
सचमुच, वहाँ उपलब्धियां ही उपलब्धियां!
सोमवार, 30 मार्च 2009
बधाई! बधाई!! बधाई!!!
जो चुनाव में खड़ा होकर
कलियुगी कृष्ण बन
भोली-भाली जनता को
गीता उपदेश दे रहे हैं।
बधाई दें उस नेता को
जो मुकुट रूपी टोपी पहन कर
साक्षात नवकुबेर बन
घर-घर वोटों की भीख मांग रहे हैं।
बधाई दें उस नेता को
जो नए-नए आश्वासन देकर
कलियुगी मोहन बन
अपने मायाजाल में सबको
सम्मोहित कर रहे हैं।
बधाई दें उस नेता को
जो जनता की फरियाद अनसुनी कर
वंशी बजैया बन
मंत्री की कुर्सी पर विराजमान
चैन की वंशी बजा रहे हैं।
बधाई दें उस नेता को
जो मंत्री की कुर्सी पर बैठ
घोटाला का महानायक बन
नित्य नए-नए घोटाले कर
धन-संपत्ति की ढेर लगा रहे हैं।
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009
बेहोशी की नयी दवा: क्या आपको मालूम?
सोमवार, 26 जनवरी 2009
अगर करना है प्यार तो...
आइये गणतंत्र दिवस के इस पावन बेला में इस कविता में पिरोये संदेश को जीवन में उतारकर सिर्फ़ दो दिन (१५ अगस्त और २६ जनवरी) का झूठा देशभक्त नहीं बल्कि हमेशा का सच्चा देशभक्त बनें:----
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अगर करना है प्यार तो...
क्षुद्र तन से नहीं, वतन से करो
वतन के जन-जन से करो
देश कर सके तुम पर गर्व
तन-मन-धन से, सच्चे समर्पण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
चाँद की चांदनी, सूरज की रोशनी से करो
पेड़, पानी, पवन से, धरती-गगन से करो
घुट-घुट कर कहीं दम न तोड़ दे
तुम अपने पर्यावरण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
बड़ी कठिनाई से मिले इस जीवन से करो
जीवन के बहुमूल्य एक-एक क्षण से करो
भूलकर भी कभी खुदखुशी का विचार न आए
निराश-हताश-उदास तुम अपने मन से करो.
अगर करना है प्यार तो...
अपने माता-पिता-गुरु भाई-बहन से करो
मजदूर, किसान, संत और सज्जन से करो
ताकि जिंदा बची रहे हमारी संस्कृति
बाइबिल, कुरान, गुरुग्रंथ, रामायण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
जो कह दिया उस वचन से करो
अपने मेहनत और लगन से करो
सोचो कैसे बने देश-दुनिया सुंदर और सुंदर
तुम अपने इस चिंतन-मनन से करो.




