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दिल्ली चलो
सुभाष चन्द्र बोस ने यह नारा दिया था। मगर आज यह नारा आज के गाँव और छोटे-बड़े शहरों के नारियों के लिए सही साबित हो रहा है. इन्हें बहला-फुसलाकर या फिर प्यार करने का नाटक करके या फिर नौकरी दिलाने के बहाने दिल्ली ले जाकर बेचकर अपना उल्लू सीधा करने वालों की कोई कमी नहीं.
आराम हराम है
कभी यह नारा भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवारलाल ने दिया था. परन्तु आज यह लागू होता है देश की नारियों पर. आज नारियों पर दोहरी जिम्मेवारी आ गई है. वह घर में भी काम करती है और दफ्तर के काम भी संभाल रही हैं. फिर भी नारी का संकट कम नहीं हुआ है. नारी काम करने वाली एक मशीन बन गई है. उनके लिए आराम हराम है।
उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त करने तक रूको मत
वैसे तो यह नारा उपनिषद से लिया गया है। परन्तु इसका प्रयोग विवेकानंद करते रहे हैं. आज नारी के रोज़-रोज़ की ज़िन्दगी यही रह गई है--उठो! जागो! और लक्ष्य यानी कि जब तक कि मृत्यु नहीं प्राप्त होता, तुम अपने पति और बच्चे की भलाई के लिए खटती-मरती रहो.
करो या मरो
अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी ने यह नारा कभी अंग्रेजों के खिलाफ दिया था. हम चंद महिलाओं को देखकर नारी के उत्थान की चाहे जितनी बातें कर लें नारी के लिए आज भी दो ही विकल्प हैं---या तो जो मैं(पुरुष) कह रहा हूँ वह करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो। चलती रेल, बस, सड़क, दफ्तर, घर या फिर वैश्यालय--हर जगह वह बलात्कार, यौन उत्पीडन, दहेज़ हत्या की शिकार हो रही हैं. हर जगह वह हुकुम का गुलाम बन कर रह गई हैं।
इन्कलाब जिंदाबाद!
यह नारा सबसे पहले क्रांतिकारी भगत सिंह ने दिया था. आज तमाम समस्यायें नारियों के साथ वहीँ का वहीँ हैं. परन्तु उनके लिए एक ढकोसले के रूप में आया है---अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. ३६४ दिन नरक में जीते रहो और एक दिन सड़क पर निकलकर नारे लगाओ--- इन्कलाब जिंदाबाद!

दोस्त बनायें २ रुपये प्रति मिनट में----फलना मोबाइल
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दोस्त बनायें* खट्टी मीठी बातें -----ढेकना मोबाइल
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दोस्तों! ये है कुछ मोबाइल कंपनियों का विज्ञापन। हम कृष्ण-सुदामा जैसे दोस्त का उदाहरण देकर एक आदर्श मित्रता की बात करते रहे हैं। तुलसीदास ने भी लिखा--धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपति काल परेखाऊ चारि ।
लेकिन अब मोबाइल और इन्टरनेट का युग है। और अब दोस्त २ रुपये प्रति मिनट और ३० रुपये प्रति माह के दर पर बनाए जा रहे हैं। मीडिया जिसे जनजागरूकता का मध्यम और लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है, ने भी देश के युवाओं को गुमराह कर दोस्त बनाने के धंधे में शामिल हो गई है. जरा एक अखबार के ख़ुद के इस विज्ञापन की झलक ख़ुद पढ़ लें---
चटपटी CHAT से मसालेदार DATE तक----------------------------------------------**कैसे लें CHAT का आनंद? मोबाइल पर टाइप करें-----और फलना नम्बर पर भेजें. ##किसके साथ लेना चाहेंगे चटपटी CHAT का लुत्फ़. अपना साथी चुनने के लिए टाइप करें------और फलना नम्बर पर भेजें.@@चटखारे भरें और मौज लें अपने संदेश अपने नाम के साथ टाइप करके फलना नम्बर पर भेजें. ++जब जी ना भरे जब तलाश हो कुछ और साथियों की CHAT के लिए तो टाइप करें नेक्स्ट और फलना नम्बर पर भेजें.
दोस्तों! बड़ी बात यह है कि किस- किस मोबाइल पर अखबार की यह सेवा उपलब्ध है इसका खुला विवरण अखबार में छपा है. विभिन्न अख़बारों में कुछ और छोटे-छोटे विज्ञापनों की झलकियाँ देखें-----@@@मजेदार बातें फलना नम्बर पर साथ में एक लडकी का फोटो
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इन सब का परिणाम जानने के लिए देश भर की अखबारें खंगालिए. रोजाना आत्महत्या करते छात्र- छात्राएं, प्रेम प्रसंगों के चक्कर में पड़कर जेल की हवा खाते नाबालिग़ लड़के और लडकियां, प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या सरीखे कई खबरें पढने को मिल सकती हैं. देश के युवों का कीमती समय और पैसा बर्वाद हो ही रहा है. मगर हम हैं कि सोये पड़े हैं. न सरकार को इन चीजों पर नज़र है और न देश के अभिभावकों को .