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रविवार, 17 जनवरी 2010

कैसी फिल्म है 'थ्री इडियट्स' ?

"तारे ज़मीं पे" के बाद "थ्री इडियट्स" एक बार पुनः शिक्षा जगत


को मनोरंजक तरीके से सही रास्ता दिखाती एक बेहतरीन फिल्म।


आज जब वैज्ञानिक और शिक्षाविद यशपाल की सिफारिश पर सी० बी ० एसई०
दशवीं की बोर्ड परीक्षा हटाने की और बढ़ रही थी यह कहते हुए कि छात्रों में दशवीं में असफल होने की स्थिति में आत्महत्या की समस्या बढ़ रही है, ' थ्री इडियट्स' ने छात्रों में आत्महत्या के सही कारणों को शिक्षाविदों, शिक्षकों, अभिभावकों के सामने रखने का ईमानदार प्रयास किया है। इसके लिए फिल्म के निर्माता, निदेशक और तमाम कलाकार को साधुवाद! निश्चय ही ऐसी फ़िल्में समाज की दशा ठीक कर एक नई दिशा देने में सफल होंगी।


आज भारत के अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को अपनी मर्जी की शिक्षा थोपते हैं। उनसे पूछते नहीं कि तुम्हें क्या बनना है। वे अपनी इच्छा से अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजिनियर बनाने का प्रयास करते हैं। यह सही है कि आंतरिक इच्छा के बिना कोई भी छात्र अपने लक्ष्य को पाने में सफल नहीं हो सकता। फिल्म इस और भी इशारा करता है कि अभिभावक या शिक्षक बच्चों पर अपनी इच्छाएं और अपेक्षाएं थोपें नहीं बल्कि उन्हें अपनी मर्जी से अपने विषय और लक्ष्य को चुनने में सहायता करें। ऐसा न करने की स्थिति में ही बच्चे परीक्षाओं में कम अंक लाते हैं, असफल होते हैं और आत्महत्या की ओर अग्रसर होते हैं।
धन्यवाद "थ्री इडियट्स"!

सोमवार, 13 जुलाई 2009

क्या आप भी इसकी गिरफ्त में हैं???















पारिवारिक संबंधों में ज़हर घोलते--- सीरियल
अपराध-अश्लीलता का पाठ पढ़ाती---फिल्में
तन-मन-जीवन को बीमार बनाते--- विज्ञापन
सांस्कृतिक मूल्यों को ध्वस्त करते---प्रोग्राम
कीमती समय को निगलते खेल बनाम व्यापार---क्रिकेट प्रसारण

वीभत्स आपराधिक घटनाओं को मनोरंजन बनाती---खबरें
क्या आप इसे "सूचना-शिक्षा-मनोरंजन" कहेंगे???
जरा सोचिये...
टीवी देखकर टाइमपास करना कितना खतरनाक हो सकता है!!!

रविवार, 28 जून 2009

सावधान! बच्चे वयस्क हो रहे हैं.....

"अपहरण" फ़िल्म देखकर अपहरण की योजना


साभार: प्रभात ख़बर

सिनेमा में हत्या=हकीकत में हत्या!!!



साभार: हिंदुस्तान

हर छोटे -बड़े शहर में सिनेमाघर। घर-घर और झोपड़पट्टी तक में टीवी नाम का छोटा सा मगर एक खतरनाक कृत्रिम प्राणी मौजूद है. टीवी---जो बंद रहने पर बड़ा ही मासूम नजर आता है, परन्तु जब खुलता है तो छोटे-बड़े सबकी बुद्धि पर ताला पड़ जाता है.
आज टीवी और टीवी पर चलने वाला सिनेमा मासूम बच्चों को वयस्क बना रहा है. टीवी पर खुल्लमखुल्ला जो अपराध, हिंसा, सेक्स और अपसंस्कृतियों को परोसे जा रहे है, वे बच्चों को उनकी आयु से पहले ही वयस्क बना रहे हैं।
फ्लोरेंस विश्वविद्यालय के अनुसन्धानकर्ताओं के भी यही विचार हैं. २००४ में छः से बारह वर्ष के लगभग ७४ बच्चों पर किये गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि रोज करीब तीन घंटे टीवी देखने वाले बच्चों में परिपक्वता के लक्षण ज्यादा आसानी से देखे जा सकते हैं। जब इन्हीं बच्चों को ७ दिन तक टीवी देखने से वंचित कर दिया गया तो सभी के शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन की मात्र बढ़ने लगी. यह हार्मोन बच्चों में शारीरिक परिपक्वता के बढ़ते ग्राफ को थामता है. टस्कन शहर के कैवरिग्लिया में कराये गए एक अध्ययन से पता चला है कि जो बच्चे टीवी, कंप्यूटर या विडियो नहीं देख पाते है उनमे मेलाटोनिन हार्मोन बहुत तेजी से बढ़ते हैं.
आज जिस तरह देश और दुनिया में बच्चों का अपराध, हिंसा और सेक्स में लिप्तता बढ़ रही है, ये अध्ययन सही सिद्ध हो रहे हैं। २००५ में झारखण्ड के देवघर शहर में तीन छोटे-छोटे बच्चो ने महावीर नाम के एक बच्चे को चाकू से गोदकर हत्या कर दी. इन बच्चों ने पुलिस को बताया कि सिनेमा में तो हत्या करने पर अपराधी को पुलिस नहीं पकड़ती है. मतलब सिनेमा के हिसाब से हत्या एक सामान्य कार्य है, जिसके लिए कोई सजा नहीं दी जाती है. और मतलब यह भी कि टीवी और सिनेमा आहिस्ता- आहिस्ता बच्चों के दिमाग में घोर आपराधिक कृत्य को भी सामान्य घटना के रूप में स्थापित कर देती है.
हाल में ही बिहार की राजधानी पटना की पीसी कालोनी से एक नौ साल के बच्चे सत्यम का अपहरण कर गला घोंटकर हत्या कर दी गई। घटना को अंजाम उसी के पड़ोस के दो नाबालिग़ लड़कों ने दिया. ये दो लड़के अविनाश और खुर्शीद ने पुलिस को अपने बयान में बताया हैं कि उन्होंने "अपहरण" फिल्म देखकर अपहरण की योजना बनायी थी.
अब वक़्त आ गया है कि हम अपने बच्चों को नकारात्मक फिल्मों और धारावाहिकों को देखने से रोकें. सरकार को भी अपराध, हिंसा और सेक्स परोसने वाली फिल्मों और धारावाहिकों पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए.

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

इसे कहते हैं होशोहवास में रहना!!!

प्रिय मित्रों! एक आसान सा सवाल है---भारत की राजधानी कहाँ है? चलिए सवाल को और आसान बना देते हैं इसके चार विकल्प सुझाकर--


१---मुंबई २---चेन्नई ३---kolkata ४---हैदराबाद


अब तो जवाब बताना आसान हो गया होगा! क्या कहा, अब भी मुश्किल हो रही है। क्यों? क्योंकि---इसमे कोई सही विकल्प नहीं हैं...क्यों ठीक है न... ...और अगर कोई इसमे से विकल्प चुनने की हिम्मत दिखाता है तो वह बेवकूफ ही बनेगा। क्या यही नहीं हो रहा हर चुनाव में??? क्या हम जिसे अपना मत प्रदान कर रहे हैं, उसने हमारी सुध ली। क्या कोई भी उम्मीदवार चरित्रवान, कर्मठ, समाजसेवी और देशभक्त हैं??? फिर अपना मत किसे और क्यों दिया जाय??? क्या हम होशोहवास में हैं???


बिहार के बक्सर के अताँव पंचायत के ५० हजार लोग इस चुनाव में अपना वोट नहीं देंगे। उनका नारा है--रोड नहीं तो वोट नहीं। लोग सुबह से ही नेताओं का इंतज़ार करते हैं। बूढे और जवान से लेकरl महिलायें और बच्चे तक नेताओं को khadedne के लिए लाठी-डंडे लेकर पहरेदारी कर रहे हैं। इनका कहना है वोट बहिष्कार के बाद भी अगर रोड नहीं बना तो हमलोग टेक्स देना भी बंद कर देंगे। सवाल है की अगर ऐसा पूरे देश में हो गया तो देश की राजनीति और नेता-मंत्री का क्या होगा?????
पढिये ख़ुद ही हिन्दुस्तान में प्रकाशित अखबार की यह कतरन----


रविवार, 5 अप्रैल 2009

सावधान! चैटिंग चाट जायेगा ज़िन्दगी

www.scrapslive.com , orkut ascii designed scraps , glitter graphics
प्रिय मित्रों! इन्टरनेट पर बातचीत यानी चैटिंग की शुरुआत फिनलैंड के जर्क्को ओयेकेरिनेन ने १९८८ में किया था। १९८९ तक इस सेवा को ४० सेवाप्रदाताओं ने उपलब्ध कराया था। धीरे-धीरे इस सेवा की प्रसिद्धि बढ़ती गई और दुनिया भर में यह फैलती चली गई। तब चैटिंग दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर दुनिया के किसी भी व्यक्ति से संपर्क का एक बडा वरदान सिद्ध हुआ था। आज यह एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है। इन्टरनेट चैटिंग चाट रहा है इंसान की जिन्दगी को। यह कई महिलाओं के लिए सौतन बन रहा है। वैवाहिक जीवन को कलहपूर्ण बना रहा है । देश और दुनिया के भोले-भाले लड़के-लड़कियों को गुमराह कर मौत के मुंह का रास्ता भी दिखा रहा है। यह लोगों को ठगने और लूटने का एक विश्वव्यापी हथियार सिद्ध हो रहा है। जरा इन ख़बरों पर गौर फरमाइये---
ऑनलाइन चैटिंग करने पर पत्नी का सर काटा
(हिन्दुस्तान: ४ अप्रैल, २००९)
रोम। इटली में एक सनकी पति ने पत्नी का सिर सिर्फ इसलिए काट दिया क्योंकि वह ऑनलाइन चैटिंग करती थी और उसके पति को शक था की उसका किसी के साथ अफेयर हो गया है। यह जारकारी इटालियन मीडिया के हवाले से प्राप्त हुई है. गियूसेपे कास्त्रो (३५) ने अपनी पत्नी मारिया (41) की हत्या सोमवार को केसेनिया स्थित उसकी घर पर कर दी थी. कास्त्रो ने पुलिस को बताया था कि मारिया अपने प्रेमी के साथ इन्टरनेट पर चैटिंग करती थी जो उसके लिए असहनीय था. पुलिस ने मारिया के घर से ३ कंप्यूटर जब्त किये हैं तथा ऑनलाइन चैटिंग के कई पासवर्ड भी रिकार्ड किये हैं.
इन्टरनेट सेक्स के आरोप में पादरी गिरफ्तार (साभार: हिन्दुस्तान)
वारेन। मिशिगन में एक कैथोलिक पादरी को इन्टरनेट सेक्स के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। समझा जाता है कि इसके जरिये वह १४ वर्षीय किशोरी को बुलाने की व्यवस्था कर रहा था. मूलतः पकिस्तान का रहने वाला रेव शेमौं बीज नामक यह ३५ वर्षीय पादरी बच्चों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करता था. इस आरोप पर उसे २० साल तक की जेल हो सकती है. उसे पांच मिलियन डालर की जमानत के लिए फिलहाल जेल में रखा गया है. उसने किशोरियों के साथ रंगरेलियां मनाने के लिए डेट्रायत में संपर्क स्थल बना रखा था. जांचकर्ताओं ने बताया कि इन्टरनेट चैटिंग रूम में नाबालिग़ से संपर्क साधने के बाद उसने उससे मिलने के लिए १७७ किमी की यात्रा की. इन्टरनेट सेक्स के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। समझा जाता है कि इसके जरिये वह १४ वर्षीय किशोरी को बुलाने की व्यवस्था कर रहा था। मूलतः पकिस्तान का रहने वाला रेव शेमौं बीज नमक यह ३५ वर्षीय पादरी बच्चों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करता था. इस आरोप पर उसे २० साल तक की जेल हो सकती है। उसे पांच मिलियन डालर की जमानत के लिए फिलहाल जेल में रखा गया है. उसने किशोरियों के साथ रंगरेलियां मनाने के लिए डेट्रायत में संपर्क स्थल बना रखा था. जांचकर्ताओं ने बताया कि इन्टरनेट चैटिंग रूम में नाबालिग़ से संपर्क साधने के बाद उसने उससे मिलने के लिए १७७ किमी की यात्रा की।
कुल मिलाकर यह कहा जाय कि अब समय आ गया है कि हम इन्टरनेट चैटिंग करते समय चौकन्ना रहें। लोगों से सपर्क के लिए इन्टरनेट चैटिंग का प्रयोग कम से कम करें। प्रेम की पींगे बढाने के लिए इसका इस्तेमाल न करें. अन्यथा आने वाले समय इसके परिणाम और भी बुरे और चौकाने वाले होंगे.

सोमवार, 23 मार्च 2009

आप बताएं कौन है असली बलात्कारी ???

प्रिय साथियों! देश में बलात्कार की दर रफ़्तार पकड़ रही है। हर आठ-दस मिनट में एक बलात्कार हो रही है। आने वाले समय में सेकंड और नैनो सेकंड में बलात्कार होगी, कहना नहीं चाहता मगर मीडिया के रुख को देखकर कहना पड़ता है। एक तरफ़ ये बलात्कार की ख़बर चटखारे ले-केकर छापते हैं, तो दूसरी तरफ़ अश्लीलता फैलाने में कोई कसार नहीं छोड़ते। वियाग्रा, कंडोम, मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाइयाँ , महिलाओं के अंतर्वस्त्रों के विज्ञापन के बहाने हर अखबार और पत्रिकाएं अश्लीलता परोस रहे हैं। टीवी चैनल तो सारी हदें पार कर रही हैं। तभी तो देश की नारियों का छेड़छाड़ से आरती और बलात्कार से पूजा की जा रही हैं। एक हिन्दी अखबार का नमूना देखिये। एक तरफ़ दुष्कर्म के प्रयास की ख़बर है और दूसरी और अश्लीलता को हवा देता एक विज्ञापन है। जरा आप ही बताइए की कौन हैं असली बलात्कारी--आम आदमी जो खून के रिश्ते को भूलकर भी बलात्कार कर बैठता है या फिर आज का मीडिया जो फ़िल्म, धारावाहिक, विज्ञापन, संगीत के माध्यम से केवल और केवल अश्लीलता फैलाते हैं और आम लोगों को बलात्कार के लिए प्रेरित कर जेल की हवा खिलाने में एक बड़ी भूमिका अदा करते हैं।






मंगलवार, 17 मार्च 2009

साइबर सेक्स: स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त खतरनाक

एक तोते को रटाया जा रहा था- शिकारी आएगा...जाल बिछायेगा...दाना डालेगा...तुम उसमें फँसना नहीं... तोते ने तो रट लिया मगर व्यावहारिक ज्ञान न होने के चलते जाल में फंस गया और तब भी वह रट लगा रहा था-शिकारी आएगा........ आज दुनिया भर के लोगों को फंसाने के लिए जाल बुने जा चुके हैं. बच्चे, युवा और बूढे सभी इसकी गिरफ्त में निरंतर फंसते चले जा रहे हैं और दूर-दूर तक इससे निकलने की संभावना नजर नहीं आ रही. ये जाल से निकलना भी क्यों चाहेंगे जब इन्हें सेक्स चैटिंग और सेक्स वेबसाइट्स का दाना चुगने में मज़ा जो आने लगा है. जी हाँ! हम www यानी वर्ल्ड वाइड वेब यानी विश्वव्यापी जाल की बात कर रहे हैं। देश के नौनिहाल इन्टरनेट के जाल में फंसकर अपना भविष्य धूमिल कर रहे हैं। वे इन्टरनेट पर सेक्स चैटिंग और अश्लील वेबसाइट्स की सर्फिंग कर रहे हैं. ब्रिन्तैन में एक सर्वेक्षण से पता चला है के हर दसवां बच्चा सेक्स चैटिंग अवश्य करता है. यह सर्वेक्षण साफ इशारा करता है के बच्चों के सामाजिक जीवन मूल्य ग़लत दिशा में जा रहे हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIHL) और कैलिफोर्निया पैसिफिक मेडिकल सेंटर के विशेषज्ञों ने 1980 से अब तक की 173 स्टडी रिपोर्टों के व्यापक आकलन के आधार पर निष्कर्ष निकाला है की टीवी, कंप्यूटर और इन्टरनेट बच्चों को धूम्रपान की लत एवं यौन गतिविधियों में भी संलिप्त करने में मुख्य रूप से सहायक साबित हो रहे हैं. कई मनो चिकित्सक इन्टरनेट की लत को एक तरह की मनोदैहिक रोग बता रहे हैं. उनका कहना है की इससे लोगों की सहनशीलता कम हो जाती है और उत्तेजना बढ़ जाती है. निर्णय लेने की उसकी क्षमता घाट जाती है और वह समाज से काटकर जीने लगता है. इन्टरनेट अधिक उपयोग करने वाले लोगों के बीच कराये गये अध्ययनों से पता चला है कि लोग इन्टरनेट के चलते सेक्स एडिक्शन एवं सेक्स एनोरेक्सिया जैसी समस्याओं के शिकार हो रहे हैं। सेक्स एडिक्शन से ग्रस्त व्यक्ति बच्चों और महिलाओं से छेड़छाड़, व्यभिचार और बलात्कार जैसे कुकृत्यों में भी लगे हो सकते हैं. वहीँ सेक्स एनोरेक्सिया का शिकार व्यक्ति अपने जीवन में मानसिक-शारीरिक स्तर पर यौन इच्छाओं और यौन संबंधों से परहेज करने लगता है. किन्सी इंस्टीच्युट फॉर रिसर्च इन सेक्स, जेंडर एंड रिप्रोडक्शन की निदेशक जूलिया हीमैन ने नेट प्रेरित एकल सेक्स प्रक्रिया को ज्यादा चिंताजनक बताया है। अमेरिका के सेक्स विशेषज्ञों के विचार में साइबर सेक्स सामाजिक रूप से व्यर्थ और हिंसक संस्कृति उत्पन्न करने का माध्यम है. एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं में अमेरिका का स्थान पूरे विश्व में पहला और भारत का दसवां स्थान है. अमेरिका में यौन समस्याओं और यौन अपराधों में तेज़ी से इज़ाफा हो रहा है. आने वाले समय में भारत जैसे विश्व के दूसरी बड़ी जनसँख्या वाले देश के युवाओं पर इन्टरनेट का दुष्प्रभाव और भयानक हो सकता है. इसलिए देश की सरकार और आमलोगों को जागरूक होने की जरुरत है.

रविवार, 8 मार्च 2009

नारी और नारे : एक हास्यास्पद समानता


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दिल्ली चलो

सुभाष चन्द्र बोस ने यह नारा दिया था। मगर आज यह नारा आज के गाँव और छोटे-बड़े शहरों के नारियों के लिए सही साबित हो रहा है. इन्हें बहला-फुसलाकर या फिर प्यार करने का नाटक करके या फिर नौकरी दिलाने के बहाने दिल्ली ले जाकर बेचकर अपना उल्लू सीधा करने वालों की कोई कमी नहीं.

आराम हराम है

कभी यह नारा भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवारलाल ने दिया था. परन्तु आज यह लागू होता है देश की नारियों पर. आज नारियों पर दोहरी जिम्मेवारी आ गई है. वह घर में भी काम करती है और दफ्तर के काम भी संभाल रही हैं. फिर भी नारी का संकट कम नहीं हुआ है. नारी काम करने वाली एक मशीन बन गई है. उनके लिए आराम हराम है।

उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त करने तक रूको मत

वैसे तो यह नारा उपनिषद से लिया गया है। परन्तु इसका प्रयोग विवेकानंद करते रहे हैं. आज नारी के रोज़-रोज़ की ज़िन्दगी यही रह गई है--उठो! जागो! और लक्ष्य यानी कि जब तक कि मृत्यु नहीं प्राप्त होता, तुम अपने पति और बच्चे की भलाई के लिए खटती-मरती रहो.

करो या मरो

अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी ने यह नारा कभी अंग्रेजों के खिलाफ दिया था. हम चंद महिलाओं को देखकर नारी के उत्थान की चाहे जितनी बातें कर लें नारी के लिए आज भी दो ही विकल्प हैं---या तो जो मैं(पुरुष) कह रहा हूँ वह करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो। चलती रेल, बस, सड़क, दफ्तर, घर या फिर वैश्यालय--हर जगह वह बलात्कार, यौन उत्पीडन, दहेज़ हत्या की शिकार हो रही हैं. हर जगह वह हुकुम का गुलाम बन कर रह गई हैं।

इन्कलाब जिंदाबाद!

यह नारा सबसे पहले क्रांतिकारी भगत सिंह ने दिया था. आज तमाम समस्यायें नारियों के साथ वहीँ का वहीँ हैं. परन्तु उनके लिए एक ढकोसले के रूप में आया है---अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. ३६४ दिन नरक में जीते रहो और एक दिन सड़क पर निकलकर नारे लगाओ--- इन्कलाब जिंदाबाद!

गुरुवार, 5 मार्च 2009

टेलिविज़न : रोग बढ़ाने वाला डॉक्टर

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अमेरिकी राष्ट्रिय स्वास्थ्य संस्थान (एन आई एच एल) और कैलिफोर्निया पेसिफिक मेडिकल सेंटर के विशेषज्ञों ने बच्चों और किशोरों पर संचार माध्यमों के प्रभाव का व्यापक अध्ययन किया है. इसके लिए वर्ष १९८० से अब तक की १७३ STUDY रिपोर्टों का व्यापक आकलन करने के बाद यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर हुआ है कि संचार माध्यमों के अधिक उपयोग का स्वास्थय पर नकारात्मक असर पड़ता है. अध्ययन से पता चलता है कि जो बच्चे टीवी, म्यूजिक, फिल्म, कंप्यूटर और इन्टरनेट का अधिक इस्तेमाल करते हैं उनमे मोटापा बढ़ने, धुम्रपान की लत पड़ने और कम उम्र में यौन गतिविधियों में संलिप्त होने की संभावना रहती है.


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ब्रिटिश सोशल ATTITUDE रिपोर्ट के अनुसार नियमित रूप से टीवी देखने वाले देखनेवाले दर्शकों में से ५७% दर्शकों ने स्वीकार किया है कि उनका स्वास्थय खराब रहता है. दूसरी तरफ ५९% लोग जो कि कभे-कभार टीवी देखते हैं, का स्वास्थय काफी अच्छा पाया गया. रिपोर्ट से ज़ाहिर हुआ है कि अधिक टीवी देखने से आँखें थक जाती है, रोशनी कमज़ोर होती है और स्थूलता बढ़ सकती है, साथ ही स्वास्थय संबन्धी अन्य विकार पैदा हो सकते हैं.




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अमेरिका के बोस्टन विश्ववद्यालय में हुए एक अध्ययन के अनुसार जो लोग अपने खाली वक़्त को टेलिविज़न देखने में बिताते हैं, उन्हें टाइप-२ मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है. यह अध्ययन महिलाओं के सन्दर्भ में किया गया था परन्तु इसके निष्कर्ष पुरुषों पर भी लागू होते हैं. अध्ययन में शामिल अधिकतर महिलाओं का कहना था कि टीवी कार्यकर्मों को देखने के कारन वे वंचित शारीरिक गतिविधियों नहीं कर पाती. अध्ययन करने वालों के अनुसार जो लोग प्रति सप्ताह पांच घंटे तेजी से टहलते हैं या व्यायाम करते हैं, उनमें मधुमेह होने की संभावना कम हो जाती है. ऐसा करने से शारीर का मेटाबोलिस्म सही रहता है और पैनक्रियाज पर्याप्त मात्र में इंसुलीन बनाता है.

रविवार, 1 मार्च 2009

२ रुपुए प्रति मिनट में दोस्त: मोबाइल कम्पनियों और मीडिया का नया धंधा

दोस्त बनायें २ रुपये प्रति मिनट में----फलना मोबाइल
make friends all over india Rs २/min---- चिलना मोबाइल
दोस्त बनायें* खट्टी मीठी बातें -----ढेकना मोबाइल

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दोस्तों! ये है कुछ मोबाइल कंपनियों का विज्ञापन। हम कृष्ण-सुदामा जैसे दोस्त का उदाहरण देकर एक आदर्श मित्रता की बात करते रहे हैं। तुलसीदास ने भी लिखा--धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपति काल परेखाऊ चारि ।
लेकिन अब मोबाइल और इन्टरनेट का युग है। और अब दोस्त २ रुपये प्रति मिनट और ३० रुपये प्रति माह के दर पर बनाए जा रहे हैं। मीडिया जिसे जनजागरूकता का मध्यम और लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है, ने भी देश के युवाओं को गुमराह कर दोस्त बनाने के धंधे में शामिल हो गई है. जरा एक अखबार के ख़ुद के इस विज्ञापन की झलक ख़ुद पढ़ लें---

चटपटी CHAT से मसालेदार DATE तक----------------------------------------------**कैसे लें CHAT का आनंद? मोबाइल पर टाइप करें-----और फलना नम्बर पर भेजें. ##किसके साथ लेना चाहेंगे चटपटी CHAT का लुत्फ़. अपना साथी चुनने के लिए टाइप करें------और फलना नम्बर पर भेजें.@@चटखारे भरें और मौज लें अपने संदेश अपने नाम के साथ टाइप करके फलना नम्बर पर भेजें. ++जब जी ना भरे जब तलाश हो कुछ और साथियों की CHAT के लिए तो टाइप करें नेक्स्ट और फलना नम्बर पर भेजें.
दोस्तों! बड़ी बात यह है कि किस- किस मोबाइल पर अखबार की यह सेवा उपलब्ध है इसका खुला विवरण अखबार में छपा है. विभिन्न अख़बारों में कुछ और छोटे-छोटे विज्ञापनों की झलकियाँ देखें-----@@@मजेदार बातें फलना नम्बर पर साथ में एक लडकी का फोटो
@@@FRIENDSHIP LINE चिलना नम्बर पर
18 yrs+ ISD rate Apply
@@@FRIENDSHIP IN YOUR CITY
DATING CHATTING RAMANCE फलना नम्बर पर
@@@मीठी बातें----चिलना नम्बर पर
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इन सब का परिणाम जानने के लिए देश भर की अखबारें खंगालिए. रोजाना आत्महत्या करते छात्र- छात्राएं, प्रेम प्रसंगों के चक्कर में पड़कर जेल की हवा खाते नाबालिग़ लड़के और लडकियां, प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या सरीखे कई खबरें पढने को मिल सकती हैं. देश के युवों का कीमती समय और पैसा बर्वाद हो ही रहा है. मगर हम हैं कि सोये पड़े हैं. न सरकार को इन चीजों पर नज़र है और न देश के अभिभावकों को .





रविवार, 22 फ़रवरी 2009

क्या आप होश में हैं???

हर गाँव...हर शहर में...
हर गली...हर घर में...
कोई न कोई...किसी न किसी न किसी के...
हो सकता है... प्यार के चक्कर में....
स्कूल--कालेज, होटल---पार्क या फिर "डेटिंग प्लेस"
कहीं भी खेला जा रहा होगा यह घिनौना खेल
घरवालों की बदनामी... रिश्तों में दरार....
एड्स के खतरे... जीवन में अन्धकार ही अन्धकार....
सावधान! आप भी पड़ सकते हैं इस चक्कर में
रोकिये ख़ुद को... बताइये टीवी--सिनेमा के नकलचियों को
लड़के--लड़कियों की प्यार भरी बातें...प्रेम-पत्रों का आदान-प्रदान...इन्टरनेट पर चैटिंग...चुम्बन...आलिंगन...देह मिलन का खेल...प्यार नहीं एक खतरनाक बीमारी है.....
अभिभावकों से
कड़ी नज़र रखिये अपने बेटे-बेटियों पर...फ़ोन पर बातें करते हुए...घर से बहार रहते हुए...स्कूल-कॉलेज में पढ़ते-लिखते हुए भी...प्रेम का चक्कर चला रहे हो सकते हैं...रोकिये उन्हें फिल्मी जोकरों की नक़ल करने से... वरना बदनामी... पछतावा... निराशा... दुःख के दिन समझिये अब आने ही वाले हैं...
विशेष:---इसे भी पढ़ें---
यह प्यार नहीं बीमारी है
आप भी कहेंगे वैलेंटाइन डे मुर्दाबाद!
ये प्रेम प्रसंग की खबरें
प्यार...यानी आत्महत्या...हत्या...बलात्कार...

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

सच्चा प्रेम आइन्स्टीन के कथन में...

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प्रिया युवाओं! दिल से आपको ढेर सारा प्यार।

लियो टाल्सटॉय ने कहा था--अगर कोई स्वर्ग है तो प्यार ही वहां जाने का रास्ता है. ...तो क्या प्यार के चक्कर में पड़कर खुदखुशी कर रहे युवा लड़के-लडकियां जो जवानी में ही स्वर्ग सिधार रहे हैं, उन पर यह कथन लागू मान लिया जाय??? हम फिल्मी प्यार के चक्कर में पड़ गए हैं. यहाँ हम प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रेम पर संतों और विद्वानों के विचार। आशा है हम प्रेम के सच्चे स्वरुप को समझ पाएंगे.

लियो टाल्सटॉय ने कहा---"यह कहना पूरी ज़िन्दगी आप सिर्फ़ एक को प्यार करेंग थी वैसे ही है जैसे यह कहना कि आपकी पूरी ज़िन्दगी तक एक ही मोमबत्ती जलती रहेगी।" प्रोर्तियस ने कहा---- "प्रेम में प्रत्येक व्यक्ति अँधा होता है।"अकबर इलाहाबादी ने कहा--- "खुदा महफूज़ रखे आपको तीनों बलाओं से,तबीबों, वकीलों से, हसीनों की निगाहों से।" प्लेटो ने कहा----"प्रेम एक गंभीर मानसिक रोग है।" मलूकदास ने कहा--- "सुंदर देही देखि कई, उपजत है अनुराग।MADHI न होती चाम की, तो जीवन खाते काग। "एक विद्वान् ने कहा---"प्रेम में गिरावट तब आती है, जब एक-दूसरे 'को' चाहने के बजाय एक-दूसरे 'से' चाहने लगते हैं।"

मुकेश जोशी ने "अहा! ज़िन्दगी" पत्रिका में लिखा---- "अन्दर की पटरियों पर 143 की मेट्रो ट्रेनें धकधक दौड़ रही है। 143 बोले तो I LOVE YOU. इस भागा-दौडी के समय में इतना धैर्य किसके पास है जो I LOVE YOU जैसा लंबा जुमला उछाले, इसलिए इसे भी 'अंकगणित' में बदल दिया गया और यह हो गया 143. इधर से 143 तो उधर से 143 बस हो गया प्रेम. आज बाबा कबीर होते तो अपने ढाई अक्षरों को १४३ में बदलते देख कहते---दिया कबीरा रोय."

किसी शायर ने कहा---" तुम मसर्रत का कहो या इस गम का रिश्ता,कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता,है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है,कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है?"हिन्दुस्तान में एक पत्रकार ने लिखा----" एक बार किसी ने फूल से कहा कितू आज तक क्यों खिलता रहा,तूने तो दी सबको खुशबूतुझे क्या मिलता रहा?फूल ने मुस्कुरा कर कहा कि देने के बदले कुछ लेना तो व्यापार है,जो देकर भी कुछ न मांगे, वही सच्चा प्यार है."
स्वामी विवेकानंद ने कहा----"प्रेम का त्रिकोण होता है--पहला कोण---प्रेम भिखारी नहीं होता. प्रेम कभी मांगता नहीं. प्रेम प्रश्न नहीं करता. प्रेम सब कुछ अर्पित कर देता है. दूसरा कोण---प्रेम भय नहीं जनता. प्रेम में भय नहीं होता. तीसरा कोण---प्रेम के लिए प्रेम. प्रेम में स्वयं अपना साध्य है. प्रेम कभी साधन नहीं बन सकता."

अलबर्ट आइन्स्टीन के कथन में प्रेम शब्द नहीं परन्तु इसकी सच्ची अभिव्यक्ति मिलती है----"मैं तो प्रतिदिन यह अनुभव करता हूँ कि मेरे भीतरी और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अनगिनत व्यक्तियों के श्रम का हाथ रहा है. इस अनुभूति से उद्दीप्त मेरा अंतःकरण कितना छटपटाता है कि मैं कम से कम इतना तो विश्व को दे सकूं, जितना कि मैंने उससे अभी तक लिया है." यह भी पढ़ें--VALANTINE DAY'S SPECIAL ---१

VALANTINE DAY'S SPECIAL----२
VALANTINE DAY'S SPECIAL ---३

VALANTINE DAY'S SPECIAL----४

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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

ये प्रेम प्रसंग की खबरें...

सबसे पहले मैं निर्मलाजी और विष्णुजी एवं होशोहवास के तमाम पाठकों से क्षमा चाहता हूँ कि हमारा यह पोस्ट केवल शीर्षक के साथ बिना ख़बरों के प्रकाशित हो गया था. मुझे ख़ुद तब पता चला जब इसे आज देखा. खैर अब खबरों के साथ प्रकाशित हो गया है. आपको हमारा पोस्ट कैसा लगा, जरूर बताएँगे.
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साभार: दैनिक जागरण(१०/०२/२००९)


साभार: हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, आज



साभार: हिन्दुस्तान



साभार: हिन्दुस्तान




साभार: हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, आज


साभार: हिन्दुस्तान

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

प्यार...यानी आत्महत्या...हत्या...बलात्कार

प्रिय मित्रों! क्या है प्यार??? क्या हो रहा है प्यार के नाम पर? अजी फिल्मवालों ने हमारा मनोरंजन करने के बहाने युवाओं को प्यार का जो पाठ पढ़ा रहे हैं उसके गंभीर परिणाम आपके सामने है। युवाओं को बिगाड़ने के लिए फ़िल्म और टीवी कम पड़ गये तो लोगों ने विदेश से "VALANTINE DAY" आयात कर लिया। आइये हम ख़ुद देखें प्यार का हस्र...



ImageChef Custom Images ImageChef.com - Custom comment codes for MySpace, Hi5, Friendster and more आत्महत्या

बलात्कार और यौन शोषण

हत्या






रविवार, 25 जनवरी 2009

देशभक्ति का पाखंड!!!

"ओये सरजी, मन में गंदे-गंदे विचार आते हैं. "आने दे पुत्तर, गंदे विचारों को कौन देखता है. बस तुम्हारे कपड़े गंदे न हों, जूते-मौजे साफ़-सुथरे हों, इसका ध्यान रखना." "सरजी, मेरे मन में कभी-कभी यह विचार भी आता है की गाँव-गाँव की हमें फेरी लगानी चाहिए." "पुत्तर! २६ जनवरी और १५ अगस्त की सुबह प्रभात फेरी कर लिया कर."
"लेकिन सरजी! हमारा विचार था कि गाँव के कमजोर बेबस गरीब शोषित लोगों की आवाज़ बुलंद की जानी चाहिए." "अरे पुत्तर बकवास है ये सब. बस ये दो दिन झंडा फहराते वक्त चंद देशभक्ति नारों से अपनी आवाज़ बुलंद करना बहुत है.
"सरजी, अगर तिरंगे को उल्टा यानी केसरिया को निचे और हरा को ऊपर रखकर फहराने में कोई हर्ज़ है क्या?" "न...न..न...ये काम तो भूलकर भी मत करना पुत्तर. जेल की हवा कहानी पड़ सकती है."
"मगर सरजी, हम ज़िंदगी भर बहुत सारे उल्टे काम करते रहते हैं. हमें देखना चाहिए था कि बच्चे शिक्षित और संस्कारवान कितने हो रहे हैं तो हम केवल देखते हैं कि बच्चे साफ़-सुथरे पोशाकों में रहते हैं कि नहीं. बापू के सत्य और अहिंसा को भूलकर असत्य और हिंसा का पाठ पढ़ते आ रहे हैं. देश के नेता जनता की सेवा करने के बजाय स्वयं की सेवा कर रहे हैं. पुलिस रक्षक होने के बजाय भक्षक हो रहे हैं. यानी सब कुछ उल्टा हो रहा है. क्या इसके लिए कोई कानून नहीं है."

"लेकिन सरजी देश में कितने किसान गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं. कितने लाचार-बेसहारे लोग सहायता के लिए चिल्ला रहे हैं. क्या हमें उनका दुःख-दर्द नहीं सुनना चाहिए?" "छोडो भी पुत्तर! २६ जनवरी और १५ अगस्त को एक-से-एक देशभक्ति के गाने सुन लिया कर, दिमाग फ्रेश हो जाएगा. लाचार-बेसहारे का टेंशन मत लिया कर. ये तो ख़ुद देश के लिए टेंशन हैं. मरने दो इन्हें. टेंशन का टेंशन ख़ुद ही कम हो जाएगा."

"सरजी, सच्चाई और ईमानदारी खोती जा रही है. बापू और सुभाष के सपने कहीं खो गये हैं. क्या हमें कुछ नहीं करनी चाहिए?" "अरे गधे, क्या तुमने अखबार में नहीं पढ़ा था--आज़ादी का पहला झंडा जिसे नेहरू ने लाल किले पर फहराया था, मिल नहीं रहा. देश के तमाम नेता परेशान हैं के आख़िर वह पहला झंडा गया कहाँ! तू अगर देशभक्ति का कोई बड़ा काम करना चाहता है तो जा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू द्वारा फहराए गये पहले झंडे का पता लगा....फिलहाल मुझे झंडा फहराने दे और चैन से देशभक्ति गाने सुनने दे...."

बुधवार, 21 जनवरी 2009

टीवी लादेन के आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक

टीवी पर विद्वानों-संतों के विचार:---
मुनिश्री तरुण सागर ने कहा--
"आज विभिन्न चैनलों द्वार देश पर जो सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं वे ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों के हमले से भी ज्यादा खतरनाक हैं."
ओशो रजनीश ने कहा:---
"क्यों लोगों को सारा दिन टेलिविज़न देखना जरूरी है? इसके मनोविज्ञान में झांकना होगा. ये लोग स्वयं के सम्बन्ध में बस कुछ भी जानना नहीं चाहते हैं. ये लोग टेलिविज़न देखने में स्वयं से बचने का प्रयास कर रहे हैं."
नील पोस्टमन ने कहा:---
"टीवी गंभीर मसले को भी मनोरंजन के थाल में सजाकर परोसता है, क्योंकि यह उसके स्वभाव में निहित है. "
कानन झिंगन ने कहा;----
"ख़ुद शाम को पैर फैलाकर लगातार टीवी देखेंगे पर उम्मीद करेंगे कि बच्चे दूसरे कमरे में जाकर पढ़े. पढने का आदर्श पहले ख़ुद को बनाना पड़ता है. "
अखंड ज्योति पत्रिका ने कहा---
"टीवी धारावाहिक वह दिखाने लगे, जो भारतीय संस्कृति का परिचायक नहीं है, पश्चिम में जो हो रहा है, जिसमे इन सबकी खुली वकालत करने वाली बातें घर-घर पहुँच रही हैं."
एक अनाम विद्वान ने कहा:---
"खाना के कौर मुंह में हो और आँखें टीवी के हिंसात्मक दृश्यों पर हो तो तन-मन और जीवन में हिंसा का पदार्पण होगा ही. "

रविवार, 4 जनवरी 2009

क्या आप भी TELEVISIONITIS के मरीज़ हैं?

@टीवी पर दिखाए जा रहे फिल्मों एवं सीरियलों के झूठे, मनगढ़ंत और तन-मन-जीवन को दूषित करने वाली कहानियो को सच्ची मानकर इन्हीं के अनुरूप जीने लगना.
#टीवी पर विज्ञापित वास्तु पर जरुरत से अधिक विश्वास करना और सिर्फ़ इन्हीं वस्तुओं को खरीदना और उपयोग करना.
@सीरियल और फ़िल्म के नट-नटीनियों और क्रिकेट खिलाड़ियों को भगवान्, अपना रोल मोडल या कोई अजूबा आदमी मानने लगना.
#टीवी-सिनेमा के कलाकारों की नक़ल उतारते हुए ख़ुद भी और अपने बेटे-बेटियों के द्वारा भी वैसे ही कपड़े और फैशन को अपनाना.
@अपने बेटे-बेटियों को फिल्मी जोकरों की तरह रिकॉर्डिंग डांस और फिल्मी गाने सिखवाने की जूनून सवार होना.
#पति-पत्नी के बीच रोज-रोज झगडे एवं विवाद होना.
@अपने बच्चों के शिक्षा एवं संस्कार देने के प्रति लापरवाह होना.
#पति या पत्नी या फिर दोनों का विवाहेतर सम्बन्ध रखना.
@स्कूल-कॉलेज जाने वाले लड़के-लड़कियों द्वारा एक-दूसरे को फिल्मी हीरो-हिरोइन समझते हुए प्यार का चक्कर चलाना और चोरी-छिपे देह-मिलन का खेल खेलना.
#घर में कैदी की तरह बंद होकर दिन-रात टीवी से चिपके रहना और अपने बच्चों में भी टीवी देखने की आदत डालना.
@अपने पड़ोसियों से ज्यादा फ़िल्म-सीरियल के कलाकारों के बारे में जानकारी रखना.
#सुंदर-सुहावने प्राकृतिक दृश्यों को देखने के लिए कभी घर से बहार न निकलना. दिन-भर बस टीवी के विभिन्न चैनलों के नकली प्राकृतिक दृश्यों को देखकर ही संतोष कर लेना.
@सिगरेट, शराब एवं कोल्ड ड्रिंक पिने की आदत का लगना.
#बच्चों का पढ़ाई-लिखाई में रूचि न लेकर फ़िल्म और सीरियल देखने में अधिक रूचि लेना.
@घर-बाहर, स्कूल-कॉलेज, चलती बस या ट्रेन में, विभिन्न सभा-सम्मेलनों में लोगों का आपस में गप्प लड़ाने का विषय फ़िल्म, सीरियल या क्रिकेट का होना.
#बच्चों का छोटी उमर में बड़ी-बड़ी बातें karna.हिंसा-अपराध की घटनाओं में दस से बीस साल के बच्चों का शामिल होना.
@कमर दर्द, मोटापा, तनाव, आँख सम्बन्धी रोग, अस्थमा, पीठ दर्द आदि rogon से grasit होना.
जरा TELEVISIONITIS के इन LAKSHANON पर गौर FARMAIYE.