
शनिवार, 31 जनवरी 2009
होशोहवास के पाठकों को बसंत पंचमी की शुभकामनाएं!!!

बुधवार, 28 जनवरी 2009
तस्वीरें बोले..सुन..सुन...सुन...
सोमवार, 26 जनवरी 2009
अगर करना है प्यार तो...
आइये गणतंत्र दिवस के इस पावन बेला में इस कविता में पिरोये संदेश को जीवन में उतारकर सिर्फ़ दो दिन (१५ अगस्त और २६ जनवरी) का झूठा देशभक्त नहीं बल्कि हमेशा का सच्चा देशभक्त बनें:----
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अगर करना है प्यार तो...
क्षुद्र तन से नहीं, वतन से करो
वतन के जन-जन से करो
देश कर सके तुम पर गर्व
तन-मन-धन से, सच्चे समर्पण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
चाँद की चांदनी, सूरज की रोशनी से करो
पेड़, पानी, पवन से, धरती-गगन से करो
घुट-घुट कर कहीं दम न तोड़ दे
तुम अपने पर्यावरण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
बड़ी कठिनाई से मिले इस जीवन से करो
जीवन के बहुमूल्य एक-एक क्षण से करो
भूलकर भी कभी खुदखुशी का विचार न आए
निराश-हताश-उदास तुम अपने मन से करो.
अगर करना है प्यार तो...
अपने माता-पिता-गुरु भाई-बहन से करो
मजदूर, किसान, संत और सज्जन से करो
ताकि जिंदा बची रहे हमारी संस्कृति
बाइबिल, कुरान, गुरुग्रंथ, रामायण से करो.
अगर करना है प्यार तो...
जो कह दिया उस वचन से करो
अपने मेहनत और लगन से करो
सोचो कैसे बने देश-दुनिया सुंदर और सुंदर
तुम अपने इस चिंतन-मनन से करो.
रविवार, 25 जनवरी 2009
देशभक्ति का पाखंड!!!
"लेकिन सरजी! हमारा विचार था कि गाँव के कमजोर बेबस गरीब शोषित लोगों की आवाज़ बुलंद की जानी चाहिए." "अरे पुत्तर बकवास है ये सब. बस ये दो दिन झंडा फहराते वक्त चंद देशभक्ति नारों से अपनी आवाज़ बुलंद करना बहुत है.
"सरजी, अगर तिरंगे को उल्टा यानी केसरिया को निचे और हरा को ऊपर रखकर फहराने में कोई हर्ज़ है क्या?" "न...न..न...ये काम तो भूलकर भी मत करना पुत्तर. जेल की हवा कहानी पड़ सकती है."
"मगर सरजी, हम ज़िंदगी भर बहुत सारे उल्टे काम करते रहते हैं. हमें देखना चाहिए था कि बच्चे शिक्षित और संस्कारवान कितने हो रहे हैं तो हम केवल देखते हैं कि बच्चे साफ़-सुथरे पोशाकों में रहते हैं कि नहीं. बापू के सत्य और अहिंसा को भूलकर असत्य और हिंसा का पाठ पढ़ते आ रहे हैं. देश के नेता जनता की सेवा करने के बजाय स्वयं की सेवा कर रहे हैं. पुलिस रक्षक होने के बजाय भक्षक हो रहे हैं. यानी सब कुछ उल्टा हो रहा है. क्या इसके लिए कोई कानून नहीं है."
"लेकिन सरजी देश में कितने किसान गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं. कितने लाचार-बेसहारे लोग सहायता के लिए चिल्ला रहे हैं. क्या हमें उनका दुःख-दर्द नहीं सुनना चाहिए?" "छोडो भी पुत्तर! २६ जनवरी और १५ अगस्त को एक-से-एक देशभक्ति के गाने सुन लिया कर, दिमाग फ्रेश हो जाएगा. लाचार-बेसहारे का टेंशन मत लिया कर. ये तो ख़ुद देश के लिए टेंशन हैं. मरने दो इन्हें. टेंशन का टेंशन ख़ुद ही कम हो जाएगा."
"सरजी, सच्चाई और ईमानदारी खोती जा रही है. बापू और सुभाष के सपने कहीं खो गये हैं. क्या हमें कुछ नहीं करनी चाहिए?" "अरे गधे, क्या तुमने अखबार में नहीं पढ़ा था--आज़ादी का पहला झंडा जिसे नेहरू ने लाल किले पर फहराया था, मिल नहीं रहा. देश के तमाम नेता परेशान हैं के आख़िर वह पहला झंडा गया कहाँ! तू अगर देशभक्ति का कोई बड़ा काम करना चाहता है तो जा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू द्वारा फहराए गये पहले झंडे का पता लगा....फिलहाल मुझे झंडा फहराने दे और चैन से देशभक्ति गाने सुनने दे...."
बुधवार, 21 जनवरी 2009
टीवी लादेन के आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक
मुनिश्री तरुण सागर ने कहा--
"आज विभिन्न चैनलों द्वार देश पर जो सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं वे ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों के हमले से भी ज्यादा खतरनाक हैं."
ओशो रजनीश ने कहा:---
"क्यों लोगों को सारा दिन टेलिविज़न देखना जरूरी है? इसके मनोविज्ञान में झांकना होगा. ये लोग स्वयं के सम्बन्ध में बस कुछ भी जानना नहीं चाहते हैं. ये लोग टेलिविज़न देखने में स्वयं से बचने का प्रयास कर रहे हैं."
नील पोस्टमन ने कहा:---
"टीवी गंभीर मसले को भी मनोरंजन के थाल में सजाकर परोसता है, क्योंकि यह उसके स्वभाव में निहित है. "
कानन झिंगन ने कहा;----
"ख़ुद शाम को पैर फैलाकर लगातार टीवी देखेंगे पर उम्मीद करेंगे कि बच्चे दूसरे कमरे में जाकर पढ़े. पढने का आदर्श पहले ख़ुद को बनाना पड़ता है. "
अखंड ज्योति पत्रिका ने कहा---
"टीवी धारावाहिक वह दिखाने लगे, जो भारतीय संस्कृति का परिचायक नहीं है, पश्चिम में जो हो रहा है, जिसमे इन सबकी खुली वकालत करने वाली बातें घर-घर पहुँच रही हैं."
एक अनाम विद्वान ने कहा:---
"खाना के कौर मुंह में हो और आँखें टीवी के हिंसात्मक दृश्यों पर हो तो तन-मन और जीवन में हिंसा का पदार्पण होगा ही. "
रविवार, 4 जनवरी 2009
क्या आप भी TELEVISIONITIS के मरीज़ हैं?
#टीवी पर विज्ञापित वास्तु पर जरुरत से अधिक विश्वास करना और सिर्फ़ इन्हीं वस्तुओं को खरीदना और उपयोग करना.
@सीरियल और फ़िल्म के नट-नटीनियों और क्रिकेट खिलाड़ियों को भगवान्, अपना रोल मोडल या कोई अजूबा आदमी मानने लगना.
#टीवी-सिनेमा के कलाकारों की नक़ल उतारते हुए ख़ुद भी और अपने बेटे-बेटियों के द्वारा भी वैसे ही कपड़े और फैशन को अपनाना.
@अपने बेटे-बेटियों को फिल्मी जोकरों की तरह रिकॉर्डिंग डांस और फिल्मी गाने सिखवाने की जूनून सवार होना.
#पति-पत्नी के बीच रोज-रोज झगडे एवं विवाद होना.
@अपने बच्चों के शिक्षा एवं संस्कार देने के प्रति लापरवाह होना.
#पति या पत्नी या फिर दोनों का विवाहेतर सम्बन्ध रखना.
@स्कूल-कॉलेज जाने वाले लड़के-लड़कियों द्वारा एक-दूसरे को फिल्मी हीरो-हिरोइन समझते हुए प्यार का चक्कर चलाना और चोरी-छिपे देह-मिलन का खेल खेलना.
#घर में कैदी की तरह बंद होकर दिन-रात टीवी से चिपके रहना और अपने बच्चों में भी टीवी देखने की आदत डालना.
@अपने पड़ोसियों से ज्यादा फ़िल्म-सीरियल के कलाकारों के बारे में जानकारी रखना.
#सुंदर-सुहावने प्राकृतिक दृश्यों को देखने के लिए कभी घर से बहार न निकलना. दिन-भर बस टीवी के विभिन्न चैनलों के नकली प्राकृतिक दृश्यों को देखकर ही संतोष कर लेना.
@सिगरेट, शराब एवं कोल्ड ड्रिंक पिने की आदत का लगना.
#बच्चों का पढ़ाई-लिखाई में रूचि न लेकर फ़िल्म और सीरियल देखने में अधिक रूचि लेना.
@घर-बाहर, स्कूल-कॉलेज, चलती बस या ट्रेन में, विभिन्न सभा-सम्मेलनों में लोगों का आपस में गप्प लड़ाने का विषय फ़िल्म, सीरियल या क्रिकेट का होना.
#बच्चों का छोटी उमर में बड़ी-बड़ी बातें karna.हिंसा-अपराध की घटनाओं में दस से बीस साल के बच्चों का शामिल होना.
@कमर दर्द, मोटापा, तनाव, आँख सम्बन्धी रोग, अस्थमा, पीठ दर्द आदि rogon से grasit होना.
जरा TELEVISIONITIS के इन LAKSHANON पर गौर FARMAIYE.
गुरुवार, 18 दिसंबर 2008
जीवन में ज़हर घोलती मीडिया
देश की संस्कृति को रौंद पश्चिम की बोल बोलती मीडिया
पत्रकारिता से आ गये हैं कितनी दूर ख़ुद अपनी पोल खोलती मीडिया
सूचना-शिक्षा-मनोरंजन के बहाने, जीवन में ज़हर घोलती मीडिया
"किसकी ख़बर", "कैसी ख़बर" से होगी मोटी कमाई, इसे मापती-तौलती मीडिया
नेता-मंत्री-अफसर-धनपति के इशारे पर आगे-पीछे डोलती मीडिया
ये जो मीडिया है, ये जो मीडिया है
मत पूछो इसने क्या-क्या किया है
बड़े ही खूबसूरती व मासूमियत के साथ
देश और दुनिया को तहस-नहस किया है
सदियों की सभ्यता-संस्कृति को
चंद लम्हों में ख़ाक किया है।
आम आदमी की गर्दन मरोड़ती मीडिया
लोकतंत्र के महल को तोड़ती मीडिया
चाटुकारिता से ख़ुद को जोड़ती मीडिया
नैतिकता से मुंह मोड़ती मीडिया
सच्चाई को पीछे छोड़ती मीडिया
ये जो मीडिया, ये जो मीडिया है
मत पूछो इसने क्या-क्या किया है
बड़े ही प्यार और मुहब्बत से इसने
लोगों को मुसीबतों का तोहफ़ा दिया है
खामोश! कुछ न कहना इसे
इसने तो बस 'मिशन' को 'कमीशन' किया है.











