रविवार, 13 दिसंबर 2009
रविवार, 6 दिसंबर 2009
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009
सोमवार, 28 सितंबर 2009
रविवार, 27 सितंबर 2009
गुरुवार, 24 सितंबर 2009
सोमवार, 21 सितंबर 2009
रेल शौचालय में धनिया के पत्ते की खुशबू!!!
प्रिय मित्रों! धनिया का पत्ता पूरे भारतवर्ष में बड़े चाव से खाया जाता है। सब्जी में अगर धनिया का पत्ता हो तो क्या खुशबू आती है। खिचड़ी में टमाटर, गोभी, मटर के साथ धनिया का पत्ता स्वाद में चार चाँद लगा देता है। ...और अब तो चाट और चटपटी में भी धनिया के पत्ते खूबसूरती और खुशबू बिखेरते नज़र आ जाते हैं। मगर क्या हम भारतीय नीचे की तस्वीरों को देखकर इसी धनिया के पत्ते को खाना पसंद करेंगे???
१९ जुलाई २००९ । मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से पटना के लिए खुली एक रेल। छत्रपति शिवाजी एक्सप्रेस। रात के अंधेरे को चीरती धडाधड रेल की पटरियों पर फिसलती रेल अचानक एक अनजाने जगह पर रूक गई। कुछ सोये हैं, कुछ जगे हैं। अचानक एक महिला की आवाज़--"निकालती हो इसको तुम कि नहीं...ज़हर खिलाओगी तुम सबको???" कोई जवाब नहीं। फिर उसी महिला की आवाज़--"निकलती हो कि नहीं? उठाकर फेंको सबको।" तब तक काफी लोग वहां जमा हो गए थे। दरअसल मामला यह था कि एक बूढी महिला अपने बेटे के साथ मिलकर धनिया पत्ते के कई बोरे इस रेलगाड़ी में ढो रही थी। बोरे को खोलकर खुली पत्तियों को रेल के छः शौचालयों में रख दिए गए थे। काफी यात्रिओं को इससे मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कुछ तो उसी शौचालय का उपयोग करने के लिए विवश थे। तभी एक महिला की नज़र उस पर पडी और उस बूढी महिला को सबक सिखाने के लिए आगे आयी। वह बूढी महिला कह रही थी--नाय बाबू , बडी खाद देले छिये। पुलिस बुलाने की बात करने पर कहने लगी कि--उ तो आके देखि लेले छे बाबू। .....तो कुछ नजारा आप भी देखिये इन तस्वीरों में और सोचिये रेल शौचालय में खुला रखकर लाये गए धनिया के पत्ते की खुशबू के बारे में जो कितने भारतीय अनजाने में सब्जियों, चाट और चटपटी में ले रहे होंगे!
१९ जुलाई २००९ । मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से पटना के लिए खुली एक रेल। छत्रपति शिवाजी एक्सप्रेस। रात के अंधेरे को चीरती धडाधड रेल की पटरियों पर फिसलती रेल अचानक एक अनजाने जगह पर रूक गई। कुछ सोये हैं, कुछ जगे हैं। अचानक एक महिला की आवाज़--"निकालती हो इसको तुम कि नहीं...ज़हर खिलाओगी तुम सबको???" कोई जवाब नहीं। फिर उसी महिला की आवाज़--"निकलती हो कि नहीं? उठाकर फेंको सबको।" तब तक काफी लोग वहां जमा हो गए थे। दरअसल मामला यह था कि एक बूढी महिला अपने बेटे के साथ मिलकर धनिया पत्ते के कई बोरे इस रेलगाड़ी में ढो रही थी। बोरे को खोलकर खुली पत्तियों को रेल के छः शौचालयों में रख दिए गए थे। काफी यात्रिओं को इससे मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कुछ तो उसी शौचालय का उपयोग करने के लिए विवश थे। तभी एक महिला की नज़र उस पर पडी और उस बूढी महिला को सबक सिखाने के लिए आगे आयी। वह बूढी महिला कह रही थी--नाय बाबू , बडी खाद देले छिये। पुलिस बुलाने की बात करने पर कहने लगी कि--उ तो आके देखि लेले छे बाबू। .....तो कुछ नजारा आप भी देखिये इन तस्वीरों में और सोचिये रेल शौचालय में खुला रखकर लाये गए धनिया के पत्ते की खुशबू के बारे में जो कितने भारतीय अनजाने में सब्जियों, चाट और चटपटी में ले रहे होंगे!
रविवार, 30 अगस्त 2009
मैं इंसान को यूँ खाता-पीता हूँ.....
रविवार, 23 अगस्त 2009
शनिवार, 15 अगस्त 2009
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